सतलुज के बहाने : दुनिया का कोई सच छिपा नहीं रह सकता

“सतलुज” पंजाब की पुलिस और बेक़सूर पंजाबियों की हत्याओं के बीच उलझी एक ऐसी डोर है। जिसका कोई सिरा, किसी के पास नही है। यह फ़िल्म उस उलझन को हूबहू उतार देती है, जो उस दौर के पंजाब और मुल्क की थी। पुलिस और प्रशासन के उस नंगे सच को दिखाने में फ़िल्म कामयाब रही, जिसे हज़ार तहों में छिपा दिया गया था।

फ़िल्म देखते वक़्त हमें लगा कि जिस दौर की यह फ़िल्म है। उस वक़्त तो इस ख़बर को लिखना ही अपने आप मे बड़े जिगरे का काम था। क्या तब जो ताक़त अपनी निरंकुशता का परिचय दे रही थीं, उन्होंने सपने में भी सोचा होगा कि इस पर कभी फ़िल्म बनेगी। कभी उनके अपराध को खोलकर रखा जाएगा। कभी तो कोई दौर आएगा, जो कहेगा कि शांति के नाम पर किया गया अन्याय, अन्याय ही है, अपराध ही है, उसे सही नही ठहराया जा सकता।

मैं फ़िल्म देखते वक़्त सोच रहा था कि जिस कथित हाफ-फुल एनकाउंटर और बुलडोज़र को हम लोग आज देख रहे हैं। आज इनके लिए बोलना मुश्किल है। आज इसके लिए खड़ा होना मुश्किल है। मगर क्या हमेशा यही दौर रहेगा, हरगिज़ नही। बनेंगी तो इस पर भी फिल्में और दुनिया देखेगी। दुनिया का कोई सच छिपा नही रह सकता और कोई भी नाजायज़ हत्या अपना असर दिखाए बिना नही रह सकती।

लाशें अपनी गवाही ख़ुद देती हैं। लावारिस कोई भी नही होता, क्योंकि वक़्त सबका वारिस है, देर सबेर सब खुलेगा और जो आज हत्याओं पर खुश हो रहे हैं, चलते बुलडोजरों पर ठहाके लगा रहे हैं। वह खलनायक बनकर खड़े होंगे। फिल्में तो इसपर भी बनेंगी।

सतलुज एक ज़रूरी फ़िल्म है। इसपर प्रतिबंध लगाने वालों को अपनी कलाई खुलने का डर था। यह सिनेमाघरों में रिलीज़ नही हो सकी, तो ओटीटी पर आई और आख़िर तीसरे ही दिन वहां भी प्रतिबंधित हो गई मगर कब तक। जब घटना छिपी नहीं, उस पर फ़िल्म भी बन ही गई, तो एक रोज़ इसका सच घर घर पहुँच ही जाएगा।

हम लोगों के पास उम्र रही तो असंख्य छर्रों से घायल कश्मीरी युवाओं की फिल्में भी देखेंगे। मणिपुर में चीखती आवाज़ों की फिल्में भी आएंगी। ठोको प्रदेश के निरंकुश अहंकारी निर्णयों पर भी फिल्में बनेंगी ही और हर वह बात, जो आज लगता है छिप गई, कल ज़्यादा खुलकर सामने आएगी।

सतलुज को रोकना नहीं चाहिए था। अगर यह रोक हटे, तो फ़िल्म ज़रूर देखिए। एक्टिंग, डायरेक्शन सब उम्दा है और कहानी सच्ची….जसवंत सिंह जैसा किरदार फिर जी उठा। वह बातें, जिन्हें इतिहास ने पीछे ढकेल दिया था, ज़्यादा मुखर होकर सामने आ गई हैं।

यह रोक हटे,तो फ़िल्म देखिए और फ़िल्म को महसूस करना हो तो अपने राज्य को इससे जोड़कर देख लीजिये, बहुत अंतर नही मिलेगा। कहानियां जब सर उठाएंगी, तब वह सारा सच तनकर खड़ा होगा, जिसे आज डराकर, धमकाकर पीछे ढकेला गया है। अन्याय कभी शांति नही लाता, यह बात सबको समझ आएगी। सतलुज हमारे दौर की बहुत ज़रूरी फ़िल्म है और यह भी सच है कि असंख्य जसवंत सिंह आते जाते रहेंगे मगर इनके बनाए रास्ते हमेशा हमेशा रहेंगे….

(हफ़ीज़ किदवई की टिप्पणी उनकी फेसबुक वॉल से साभार)

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